Der Ton wird rauer: Impfpropaganda und Wirklichkeit – [Sciencefiles-Monatsrücklick]

Der Juni ist nur noch eine nasse Erinnerung. Ja, nass. Das, was im Juni an Regen aus dem Waliser Himmel gekommen ist, das reicht für den Juli und den August. Indes hat sich diese Erkenntnis noch nicht bis zum Juli herumgesprochen. Es regnet weiter… Der Sommer, der uns vom Klimawandel versprochen wurde, lässt weiter auf sich warten.

Nicht mehr warten müssen unsere Leser auf unseren Monatsrückblick. Er ist etwas verspätet. Sie kennen das, man beginnt, und es kommt etwas dazwischen. Man verschiebt, auf “ganz bestimmt” Tag X, und, nein, am Tag X muss man unbedingt Studie Y besprechen oder Journalisten-Darsteller XY verarzten … Und so könnte das bis zum nächsten Monat gehen, wenn nicht der Waliser Regen einen Versuch, den viel zu hohen Rasen zu mähen, im Keim erstickt hätte.

Auch im Juni haben uns viele Leser unterstützt, Hinweise, Kommentare und finanzielle Unterstützung haben uns den Betrieb von ScienceFiles ermöglicht. Unser Dank gilt allen Lesern, und ganz herzlich wollen wir uns bei den Lesern bedanken, die durch einen finanziellen Beitrag dafür sorgen, dass es ScienceFiles weiterhin gibt:

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Allen, die ScienceFiles ermöglichen, gilt unser herzlichster Dank.

Und wie immer an dieser Stelle: Wer dafür sorgen will, dass wir auch morgen noch der Stachel im Fleisch all derer sind, die versuchen, durch Missbrauch von Wissenschaft oder Verbreitung von Desinformation, eine normale Diskussion zu verhindern, wie das heute wieder bei der ARD der Fall war, der kann dazu mit einer kleinen, mittleren, großen Spende an uns beitragen:

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Wie so viele Monate vorher, so stand auch der Juni ganz im Zeichen von SARS-CoV-2, dessen Herkunft weiter ungeklärt ist, wenngleich die von uns favorisierte Laborherkunft: Das Virus ist aus dem Wuhan Institute of Virology freigesetzt worden, absichtlich oder unabsichtlich, neue Unterstützung erhalten hat, und zwar in Form einer Studie, in der gezeigt wurde, dass es SARS-CoV-2 nicht möglich ist, Fledermäuse einer mit dem angeblichen Fledermaus-Ursprung von SARS-CoV-2 eng verwandten Spezies zu infizieren. Seltsam.

Asymptomatische Verbreitung von SARS-CoV-2 ist die Grundlage für alle Maßnahmen, die dazu gedacht sind, das Virus in Schach zu halten. Die Evidenz dafür, dass SARS-CoV-2 gar nicht über asymptomatische Träger des Virus verbreitet werden kann oder nur schwierig verbreitet werden kann, wird immer dichter.

Dessen ungeachtet läuft die Propaganda-Maschinerie auf Hochtouren, um die sprudelnden Geldbrunnen von Pfizer, Moderna, Johnson&Johnsen usw. am Laufen zu halten. Indes muss man sich schon fragen, was das für Impfstoffe sind, was COVID-19 für eine Krankheit ist, wenn man Propaganda auffahren muss, um Bürger vom vermeintlichen Nutzen der Impfung zu überzeugen. Wie heftig Deutsche mit Propaganda attackiert und wie sie dabei belogen werden, darüber haben wir einige Beiträge im Juni verfasst:

Bevor Sie sich impfen lassen, sollten Sie sich darüber klar sein, dass die Gentherapien von Pfizer und Moderna ihr Immunsystem neu programmieren.

Es wäre schon seltsam, wenn Impfstoffe, die schnell entwickelt wurden, deren klinische Trials nicht bis zum Ende durchgeführt wurden, über deren Langzeitfolgen keinerlei Wissen vorhanden ist, nicht kritisiert würden. Aber es  wäre ebenso seltsam, wenn die Kritik nicht von Regierungen und ihren Häschern in den Medien bekämpft und unterdrückt würde. Also lesen Sie bei uns von den Kritikern und ihrer Kritik

Die Nebenwirkungen, die sich mit COVID-19-Impfstoffen verbinden, sind schon seit März Thema auf ScienceFiles. Unsere systematischen Auswertung der VigiAccess-Datenbank hat eine Reihe von Beiträgen erbracht, die sich mit dem Sterberisiko oder den fast durchgängig im menschlichen Organismen zu findenden Thrombosen nach Impfung befassen.

Dass das, was die Bundesregierung als Wirklichkeit der Impf-Nebenwirkungen verkaufen will, bestenfalls eine Halbwahrheit ist, war ebenfalls im Juni Gegenstand auf ScienceFiles, denn die Indizien dafür, dass ernsthafte Nebenwirkungen verheimlicht werden, häufen sich, so dass man davon ausgehen muss, dass hier etwas vertuscht werden soll. Ob es das katastophale Verhältnis von Kosten und Nutzen ist, das mit einer COVID-Impfung verbunden ist und dazu führt, dass auf 100.000 Impfungen 4 an Nebenwirkungen Verstorbene, maximal 11 vor dem Tod Geretteten gegenüberstehen, ist eine offene Frage. Dass erhebliche Nebenwirkungen wie Myokarditis und Perikarditis mittlerweile die Wand der Nebenwirkungs-Verschweiger zu durchbrechen im Stande ist, weist darauf hin, dass die Sache mit den Nebenwirkungen schlimmer ist als dargestellt.

Wie unsere Analysen auf Basis von VigiAccess regelmäßig zeigen, sind die Nebenwirkungen nicht auf bestimmte Organe oder Regionen im menschlichen Körper beschränkt. Sie finden sich vom Kopf/Gehirn bis in den Verdauungstrakt, was seine Erklärung darin finden kann, dass der Impfstoff nicht stationär bleibt, das Spike-Protein und das S-Protein über die Blutbahn fast nach Belieben verteilt werden.

Dass hohe Risiken nur dann in Kauf genommen werden können, wenn ihnen ein hoher Nutzen gegenübersteht, das sagt schon der gesunde Menschenverstand. Vielleicht wird deshalb bei der Frage der Effektivität so selektiv berichtet und die geringe absolute Effektivität oder die erschreckend schlechte Impfbilanz verschwiegen. Vielleicht finden deshalb Studien, die zeigen, dass für große Teile der Bevölkerung eine Impfung unsinnig ist, weil sie bereits Antikörper gegen SARS-CoV-2 gebildet haben, in MS-Medien keinerlei Resonanz.

Wenn die Gefahr, von der behauptet wird, dass es sie gibt, dass sie von SARS-CoV-2 und COVID-19 ausgehen würde, nicht offensichtlich, eigentlich überhaupt nicht sichtbar ist, dann muss man sie inszenieren. Die entsprechende Inszenierung beginnt mit Long Covid, sie kommt ohne neue, immer schrecklichere Varinaten von SARS-CoV-2 nicht aus und bedarf deshalb des ständigen Variantennachschubs. Und wieder einmal erweist sich das Vereinigte Königreich als das Land, das aus der Reihe schert und die schöne Inszenierung durch volle Stadien, die zeigen, dass sich zehntausende Menschen treffen können, ohne in Folge zu sterben, bloßstellt. Nicht nur das, die Briten wollen SARS-CoV-2 medikamentös zu Leibe rücken und prüfen die Wirksamkeit von Ivermectin.

Ausgleich zu dieser schweren COVID-Kost hat im Juni Dr. habil. Heike Diefenbach geboten, und zwar in Form zweier Beiträge, die den Pierre Bourdieu zeigen, der unter denen, die sich aus nicht nachvollziehbaren Gründen für Soziologen halten, gar keine Gegenliebe findet, der Bourdieu, der Soziologie als die Regierenden störende, nicht wie das heute der Fall ist als die Regierenden anschleimende Wissenschaft konzipiert hat. Und der Pierre Bourdieu, der als einer der Ersten beschrieben hat, wie Meinungsumfragen genutzt werden, um eine Realität zu inszenieren, die es nicht gibt. Neben der ständigen Vorgaukelung einer nicht existenten Realität sind auch die vielen Kostgänger bzw. Schmarotzer ein Ärgerniss, die ihr Auskommen als Bauchredner verdienen, die für Dritte sprechen und dabei seltsamerweise immer das sagen, was die Regierung gerne hören will. Ein sehr wichtiger Beitrag, den Dr. Diefenbach im Juni für ScienceFiles geschrieben hat, der bezieht sich auf die aus dem China Maos übernommenen Versuche, Menschen am eigenständigen Denken zu hindern, sie quasi zu impfen, damit sie zu keiner kritischen Haltung gegenüber Regierungspolitik mehr in der Lage sind.

Wer denkt, China ist China und Deutschland ist woanders, der sieht sich getäuscht, denn im BMBF wird bereits damit geliebäugelt, über soziale Konten Punkte an die zu vergeben, die sich als besonders liebe Bürger erwiesen haben und natürlich Minuspunkte für diejenigen, die kritisieren und eigenständig denken wollen. Wie weit die Orwellsche Zeit schon vorangeschritten ist, zeigt Forschung von Microsoft, die die Speicherung von Daten in DNA zum Gegenstand hat. Wenn ihnen das alles Orwellianisch vorkommt, dann haben sie noch nicht alles zu diesem Thema gelesen.

Seit Juni stellt Dr. Sebastian Lüning auf ScienceFiles regelmäßig seine neue Klimaschau vor. Wer fundiert über Klima, Klimawandel und alles, was dazu gehört, informiert werden will, für den ist die Klimaschau ein Muss.

Politische Korruption ist zum festen Thema auf ScienceFiles geworden. Im Juni haben wir wieder einmal davon berichtet, wie sich Parteien an Bürgern bedienen und wir haben über schmutige Tricks berichtet, die den systematischen Raub von Freiheitsrechten zum Gegenstand des Stiftungsrechts gemacht haben.

Das ist unsere Auswahl der mehr als 70 Beiträge, die es im Juni auf ScienceFiles zu lesen gab. Wir hoffen, Sie konnten sich im Juni bei uns gut informieren und unterhalten.



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