Impf-Radikalisierung angesichts einstürzender Lügenwelten – ScienceFiles Rückblick auf den Mai

Vorbei ist er, der Wonnemonat.
Viel Wonne hat er nicht gebracht. Viel Regen hat er gebracht. Heftig hat es in unseren Ginster und unseren Flieder geregnet. Das hat die Blüte verkürzt, und das nehmen wir gerade bei Wohlgeruch verströmenden Pflanzen sehr übel. Falls der Juni unserem Allysum auch so übel mitspielt, müssen wir mit Petrus ein ernstes Wort darüber reden, was für eine seltsame Vorstellung von Klima er neuerdings hat.

Apropos seltsame Vorstellung von Klima: Global Warming zeichnet sich dadurch aus, dass es kälter wird. Aber keine Sorge, wenn es kälter wird, dann ist das Wetter, nur warme Tage zählen als Klima. Falls Ihnen die öffentlich-rechtlichen “Koryphäen” in Sachen Klima zu blöd sind, dann empfehlen wir Sebastian Lüning als Gegenmittel. Kenntnis hat noch jede Ideologie vertrieben. Aber die Ideologie blüht, und sie treibt Stilblüten, wie z.B. in einem Antrag der Grünen, in dem nunmehr Menschenrechte und Klimanwandel so vermauschelt werden, dass der Schutz von Menschenrechten, durch die Beseitigung von Menschenrechten dabei herauskommt. Niemand, der die Grünen wählt, soll sagen können, er hätte nicht gewusst, dass er seine Stimme für Faschisten abgibt. Zurück zu den Koryphäen des öffentlich-rechtlichen Klimawandels, die tatsächlich erklären, dass die Sonne nichts mit dem Klima zu tun hat. Wir haben das die Neuronenfinsternis der ARD genannt, was die Anwesenheit von Neuronen voraussetzt. Im Nachhinein sind wir uns nicht mehr sicher, ob diese Annahme vertretbar ist.

Auch im Mai wurde ScienceFiles wieder durch die Unterstützung unserer Leser möglich gemacht. Informationen, Kommentare, Hinweise und finanzielle Unterstützung sorgen dafür, dass Sie ScienceFiles im gewohnten Stil und Format auch im Mai lesen konnten. Dafür bedanken wir uns vor allem bei den folgenden Spendern:

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Wenn Sie auch im Juni dafür sorgen wollen, dass wir auf ScienceFiles die Studienergebnisse berichten, die in MS-Medien verschwiegen werden, die Hysterie dämpfen, die von MS-Medien verbreitet wird, Junk Studien zerlegen und wissenschaftliche Studien besprechen, deren Ergebnisse wissenswert sind, dann freuen wir uns auf und über ihre Unterstützung!

Vielen Dank!


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Der Mai ist der Monat, in dem das, was wir schon seit Februar 2020 schreiben, im Mainstream angekommen ist: SARS-CoV-2 stammt mit hoher Wahrscheinlichkeit aus dem Wuhan Institute of Virology. Der Krieg, um dieses Faktum bzw. seine Vertuschung ist in vollem Gange. So haben die Forscher aus dem Wuhan Institute of Virology eine Reihe ganz neuer Coronaviren, die sie in ihren Katakomben gefunden haben, jenen Katakomben von denen kaum jemand weiß, welche Coronaviren sich noch darin verstecken, aus dem Hut gezaubert. Damit soll natürlich die Spur, die ins WIV führt, verwischt werden. Damit das zumindest in den Reihen unserer Leser nicht gelingt, haben wir das, was wir als COVID-19 Komplott bezeichnen, zusammengestellt. Ergänzt haben wir diesen Beitrag mit einem Beitrag, in dem die 10 häufigsten Irrtümer über das WIV und SARS-CoV-2 zusammengestellt sind.

Der Mai ist auch der Monat, in dem eine spürbare Impfradikalisierung stattgefunden hat. Polit-Darsteller preisen ihren Heiltrunk wie Sauerbier an und wollen am liebsten jeden impfen. Die Hektik, mit der mRNA und Adenoviren in Oberarme gespritzt werden sollen, steht in einem eklatanten Gegensatz zur nicht stattfindenden Diskussion über ungeklärte Risiken, die mit einer Impfung einhergehen. Sie findet ohne Auseinandersetzung mit Ärzten, Medizinern und Wissenschaftlern statt, die vor einer Impfung warnen, und zwar nicht nur in Europa und den USA, sondern auch in Süd- und Mittelamerika. Und sie findet ohne Rücksicht auf die Nebenwirkungen statt, die von Impfstoffen ausgehen und die Peter McCullough dazu veranlasst haben, von einem toxischen biologischen Stoff zu sprechen.

Wir haben die Nebenwirkungen, die in der WHO-Datenbank Vigiaccess gesammelt werden, in einer Reihe von Beiträgen dokumentiert und versucht, in Relation zu setzen:

Dass das Impfexperiment mit einem bedingt zugelassenen und nur mangelhaft getesteten Impfstoff nun auch auf 12-15jährige ausgeweitet werden soll, hat uns veranlasst, die Daten des klinischen Trials zu analysieren. Ergebnis: Erschreckend. Dass Polit-Darsteller und ihre Helfershelfer in freier Rotation unterwegs sind, zeigt auch die Absicht, Impfstoffe zu mischen. In den Dokumentationen aller Impfstoffhersteller, die derzeit an der Hysterie verdienen, steht ausdrücklich, dass es keinerlei Kenntnis über die Wechselwirkung mit anderen Impfstoffen gibt. Wenn schon Experiment, dann richtig, denken sich offenkundig diejenigen in Polit-Darstellerkreisen, die mit der Gesundheit anderer spielen, der Gesundheit von Kindern zum Beispiel, die nach Impfung mit Comirnaty gehäuft Fälle von Myokarditis zeigen. All diese Risiken gehen mit einer eklatanten Unsicherheit über die positive Wirkung einher. Was es mit dem Impfschutz auf sich hat, haben wir entsprechend aufgearbeitet.

Nicht nur die Lügengeschichte, die um den Ursprung von SARS-CoV-2 gebaut wurde, fällt langsam in sich zusammen, auch das “Narrativ” um PCR-Tests hat erheblichen Schaden genommen. Dass alle Zweifel, die an der Verlässlichkeit von PCR-Tests angemeldet wurden korrekt sind, zeigt eine Studie, die wir besprochen haben, eine andere, eine deutsche Studie, nimmt den Hoax auseinander, der sich mit der nationalen PCR-Teststrategie verbindet. Die Ergebnisse dieser Studie wollen wir etwas ausführlicher würdigen:

  • Ein positiver PCR-Test bedeutet nicht immer, dass ein infektiöses Virus nachgewiesen wurde (4); [d.h. PCR-Tests sind nicht verlässlich.]
  • Das Ergebnis eines PCR-Tests wird von Eigenschaften des Getesteten und von Testfaktoren (Anzahl Zyklen, Laborverunreinigungen etc.) beeinflusst (4) [d.h. PCR-Tests sind anfällig für allerhand Einflüsse, die das Ergebnis zunichte machen];
  • “PCR-Tests entdecken nicht die Existenz des Virus (SARS-CoV-2), sie entdecken eine bekannte genetische Sequenz, von der auf die Existenz von SARS-CoV-2 zurückgeschlossen wird” (4) [d.h. auf die Existenz von SARS-CoV-2 wird geschlossen, SARS-CoV-2 wird nicht in der Probe nachgewiesen];
  • Die WHO hat darauf hingewiesen, dass positive Tests immer im Bezug zu klinischen Symptomen bei den Getesteten gebracht werden müssen. Der RT-PCR-Test ist kein eigenständiges Diagnosemittel [als solches ist er unbrauchbar] (4);
  • Die Rate positiver PCR-Tests steht in einem direkten Zusammenhang mit der nationalen Teststrategie (11) [mit politischen Entscheidungen kann die Anzahl positiv Getesteter direkt beeinflusst werden];
  • Es gibt kaum Daten, die zeigen, dass mit RT-PCR-Tests positiv Getestete auch seropositiv sind (11) [Kaum jemand prüft die Frage, ob das, was RT-PCR-Tests zu messen vorgeben, auch das ist, was sie messen];
  • “Mit dem Test symptomatischer Personen steigt der Anteil der positiven Tests in unserer Stichprobe, es kann jedoch nicht ausgeschlossen werden, dass dies auf andere Coronaviren zurückzuführen ist, die grippeähnliche Symptome hervorrufen” (11) [Dass mit RT-PCR-Tests andere Coronaviren als SARS-CoV-2 ausgegeben werden, kann nicht ausgeschlossen werden];
  • “Ob RT-PCR-Tests in der Lage sind, zuverlässig zwischen denen, die mit SARS-CoV-2 infiziert sind, und denen, die es nicht sind – eingeschlossen sowohl falsch positive als auch falsch negative Tests – zu unterscheiden im Stande ist, wurde NIE für eine größere Population getestet.” (12) [Niemand will wissen, ob RT-PCR-Tests überhaupt etwas messen];
  • Angesichts unserer Ergebnisse, die zeigen, dass mehr als 50% der positiv Getesteten nicht infektiös sind (eine Umschreibung für gesund), sollten positive Testergebnisse nicht zur Grundlage genommen werden, um einschneidende Maßnahme wie non-pharmazeutische Interventionen (Lockdowns) zu begründen” (12) [Lockdowns und andere Formen des Raubs von Freiheitsrechten sind auf Basis von RT-PCR-Tests nicht zu rechtfertigen];
  • Aus epidemiologischer Perspektive verbindet sich mit COVID-19 Toten dieselbe Problematik, wenn die Bestimmung “mit COVID-19 gestorben” auf einem PCR-Test und nicht auf einer seropositiven Blutprobe basiert (12) [Wie viele derjenigen, die als COVID-19-Tote gelten, tatsächlich an COVID-19 verstorben sind, das ist eine offene Frage, die leicht beantwortet werden könnte, wenn man das wollte. Dass sie es nicht wird, zeigt, dass das Ausmaß des Betrugs verheimlicht werden soll].
  • Die Verwendung von RT-PCR-Tests als Goldstandard ignoriert vollständig, dass 50% bis 75% der positiv Getesteten nicht infektiös sind (eine Umschreibung von GESUND) (13) [50% bis 75% der positiven Tests sind Trash];
  • Unsere Ergebnisse stellen die bisherige Praxis, SARS-CoV-2 Infektionen über RT-PCR-Tests festzustellen und die resultierenden Zahlen zur Grundlage zu nehmen, um einschneidende Maßnahmen wie Non-Pharmazeutische Interventionen, inklusive Quarantänemaßnahmen, Isolation und Lockdown zu begründen, vollständig in Frage” (13) [Die Strategie der Bundesregierung zur Eindämmung der “Pandemie” steht auf keinerlei wissenschaftlicher Grundlage];

Nach all dem ist es wenig verwunderlich, dass sich die angebliche Sorge der Polit-Darsteller um die “Volksgesundheit”, nicht auf Schüler erstreckt, die unter Lockdown und anderen unsinnigen Maßnahmen leiden und, wie eine Studie zeigt, systematisch im Regen stehen gelassen werden.

Die Frage, worum es eigentlich bei den Maßnahmen gegen SARS-CoV-2 geht, hat im Mai noch einmal neuen Zündstoff erhalten, angesichts einer offenkundig wirkungslosen Bundesnotbremse, die die Grundlage bietet, um die “Verordnung zur Regelung von Erleichterungen und Ausnahmen von Schutzmaßnahmen zur Verhinderung der Verbreitung von COVID-19” zu verabschieden, die wiederum den gesunden Deutschen abschafft und durch den (de facto zwangs-)geimpften Deutschen ersetzt. Die Bedeutung, die “den Menschen” zugewiesen wird, kommt auch in der Amtssprache deutlich zum Ausdruck, einer ent-menschlichten Amstsprache, die der Entmündigung von Bürgern dient. Kontrolle und Überwachung steht nur unverhohlen als Ziel hinter dem ganzen Zinnober und dass Beiträge, in denen Betroffene von erheblichen Nebenwirkungen einer COVID-Impfung berichten, auf Facebook gelöscht werden, ohne dass sich einer der so unsäglich um die Meinungsfreiheit besorgten Polit-Heuchler darüber aufregt, rundet das Bild nur ab.

Kontrolle ist umso leichter, je mehr Angst man verbreiten kann, um die Kontrolle zu rechtfertigen. Varianten von SARS-CoV-2, generell noch schrecklicher, noch ansteckender, noch tödlicher, spielen dabei eine wichtige Rolle. Das Variantenroulette hat sich auch im Mai gedreht, gefallen ist die Kugel auf Indien, gezogen wurde die Thai-Variante und wenn wir schon in Asien minus China, denn China ist ausgenommen, sind, dann gleich noch eine Vietnam-Variante”.

Dass die x-te Studie zeigt, dass Lockdown keinerlei positive Auswirkung auf die Fallzahlen hat und die Pandemie nur in die Länge zieht, verweist einmal mehr darauf, dass es schon lange nicht mehr um Schutz, Gesundheit oder Wissenschaft, sondern ausschließlich um Kontrolle und Überwachung geht. Und wem das noch nicht reicht: Eine Studie aus Mexiko zeigt, dass es mit einer medikamentösen Lösung, mit Ivermectin gelingt, die Verbreitung von SARS-CoV-2 zu unterbinden. Wer will, der kann SARS-CoV-2 also wirkungsvoll bekämpfen. Wer will!

Aber mit dem Wollen ist das so eine Sache: Es wird nicht gewollt. Wir befinden uns in der COVID-19 Lügenspirale, einem Ausdruck politischer Korruption, die nicht auf SARS-CoV-2 beschränkt ist, wie wir mit einem Beispiel aus der UN gezeigt haben. Die Zeitrechnung beginnt hier im Dezember 2013 mit der Resolution 68/237, in der die Mitgliedsländer der UN dazu verpflichtet werden, die Anerkennung und Entwicklung von Menschen afrikanischer Herkunft zu förden und gegen Rassismus zu kämpfen. Das ist eine Vorlage zur Selbstbereicherung für unzählige Gruppen, die wir aufgelistet haben.

Auch im Mai hat uns öffentlich-rechtliche FakeNews beschäftigt. Die ARD behauptet, dass jeder fünfte Unternehmensgründer Migrationshintergrund haben soll. Das ist schlicht falsch. Das ZDF behauptet, Impfstoffe seien ganz regulär zugelassen. Das sind sie nicht, auch das ist falsch.

Derartige Fake News gehören in das, was bei öffentlich-rechtlichen Medien “Framing” genannt wird, ein Versuch, Konsumenten zu manipulieren und über den Tisch zu ziehen, wie es ihn grundsätzlich gibt, wenn es um Extremismus geht, der in öffentlich-rechtlichen Medien generell ein Rechtsextremismus ist. Da vergisst man schon einmal 225 Brandstiftungen von Linksextremen, wenn es darum geht, sich über eine Hakenkreuz-Schmiererei aufzuregen. Zum Framing-Projekt gehören auch die nützlichen Idioten aus der institutionalisierten Wissenschaft, die untersuchen, wie man Menschen manipulieren/belügen muss, damit sie sich impfen lassen.

Das Beste zum Schluss: Dr. habil. Heike Diefenbach hat im Mai eine Reihe von wissenschaftlichen Beiträgen geliefert, die sich mit Mill und dem, was er soziale Tyrannei genannt hat, beschäftigt haben und für die Übersetzung von Mill aus dem Englischen ins Deutsche einige Sinnenstellungen aufgezeigt haben, die einem Schaudern lassen. Wie sich manche derer, die sich einbilden, sie seien dazu qualifiziert, uns anderen zu erzählen, wie wir zu leben haben, dieses Leben für uns vorstellen, das ist Gegenstand eines weiteren Beitrags. Ein Beitrag, in dem Dr. Diefenbach aufzeigt, wie Ergebnisse, die es nicht gibt, phantasiert werden, um eine ideologische Agenda zu bedienen, rundet das Bild ab.

Schließlich haben wir im Mai die Schwelle von 10.000 Abonnenten mit unserem Telegram-Kanal genommen. Derzeit sind wir schon wieder 1000 Abonnenten weiter. Gut so. Es wächst. Und das macht Spaß. Wir hoffen, Sie hatten im Mai auch Spaß mit ScienceFiles.

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